KOHARE-KO-MAAT | MOTIVATIONAL POEM | POETRY BY ASHUTOSH

कोहरे को मात

sunshine, throug, tree

सूरज की वो रोशनी धुप दिखाती जाती है
पर ठण्ड के कोहरे की मात वो भी खाती है।
लेकिन फिर भी हराती है कोहरे को
हर पल हराती जाती है
हर रोज सूरज उगता है
पर कोहरे के लपटों के कारण किसी को नहीं वो दिखता है।
फिर भी वो उगता है और
खुद से आशा करता है।
एक दिन दिखेगा वो उस वन में
जिसमे प्रयास उसके उगने के सफल हो जाते
खुद को दिखाने को रोशनी छलका कर बादल छाट देता है।
ठण्ड से बचाने को रोशनी फैलाता है
सूरज ही वो सूरज है जो ठण्ड के कोहरे को मात देकर आता है
नहीं किसी का बस है चलता
रजाई में दुबके दिन है ढलता
कोहरे की मार सब पे परती है
जब दिन को रात और रात दिन को बदलता है
कोहरा ही वो कोहरा है जो सबके परेशानी का मोहरा है।
सतरंज की चाल चलकर के बस मौसम में ही बह रहा है।
इसी हवाओ के बहने से तो ठंडी अपना अहसास दिलाती है
कि आ गई हैं वो ठंडी जिस ठण्ड को अपने दुहाई दी
पेड़ काट-काट कर के आपने ठंडी की विदाई की
मौसम की मार को झेलकर के हमने भी खुद को परोसा है
प्रकृति की इस दुनिया में आपने नहीं हमने भी किया बसेरा है
पर सूरज की किरणों से मै बाल -बाल नहीं बच पाती
उसकी तेज रोशनी से जलकर राख हो जाती हूँ।
फिर भी सूरज की वो रोशनी धुप दिखती जाती है
पर ठण्ड के कोहरो की मात वो भी खाती है।

kOHARE Ko Maat

cold, winter, sun
kohare ko maat

Suraj Ki Wo Roshani Dhup Dikhaty Jaty Hai

Per Thand Ke Kohare Ko Maat Wo Bhi Khaty Hai

Lekin Phir Bhi Haraty Hai Kohare Ko

Her Pal Haraty Hai Kohare

Her Roj Suraj Uagata Hai

Per Kohare Ke Lapato Ke Karan Kisi Ko Nahi Wo Dikhaty Hai

Phir Bhi Wo Ugata Hai Aur

Khud Se Asha Karata Hai

Ak Din Dikhega Wo Us Van Me Jisame Prayas Usake Ugane Ke Safal Ho Jate

Khud Ko Dikhane Ko Roshani Chhalakar Badal Chhat Deta Hai

Thand Se Bachane ko Roshani Failata Hai

Suraj H Wo Suraj Hai jo Thand Ko Maat Dekar Ata Hai

Nahi Kisi Ka Bus Hai Chalata

Rajai Me Dubake Din Hai Dalata

Kohare Ki Maar Sub Pe Padaty Hai

Jub Din Ko Raat Aur Raat Din Ko Badalta Hai

Kohara H Wo Kohara H Jo Sabake Pareshani Ka Mohara Hai

Satranj Ki Chaal Chalkar Ke Bus Mausam Me H Baha Raha H