चले मूल ढूँढ़ने - Poetry by Ashutosh
road, tree, rural

चले मूल ढूँढ़ने

best poem

हम हारे जुआरी, हम अद्भुत भिखारी,
है झूठी सी पूजा, हम झूठे पुजारी।
फूलों से इतना डरे, चले शूल ढूँढ़ने।
शाखाये सम्भली नहीं, चले मूल ढूँढ़ने।।

यह अम्बर देख रहा है झूठ सच्चापन जग का,
चाहे पर रोक न सके खुद ही चल देना मग का।
जीवन तम का बसेरा, देख किसने उजेरा,
सबकी मुंदती सी आंखे, बरसो सोया सवेरा।
एक एक पग दोषपूर्ण था, चले भूल ढूँढ़ने।
शाखाये संभली नहीं, चले मूल ढूँढ़ने।।

वेगवती गंगा है यह, देखा है युग-पल का क्रम,
इससे है क्या छिपा हुआ, अनावरित है हर एक भ्रम।
झूठी है हर समीछा, मन को साले है दीछा,
हर एक पग पर ही भ्रम है, जीवन शाश्वत परीछा।
चन्दन मस्तक तपा रहा, चले धूल ढूँढ़ने।
शाखाये संभली नहीं, चले मूल ढूँढ़ने।।

यह जीवन पढ़ा न गया, ऐसा एक विशद ग्रन्थ है,
चल-चल कर हारे चरण, एक अंतहीन पन्थ है।
थकता जाता श्वसन है, अब तो बोझिल नयन है,
हरी आशा-निराशा, यह ही तो चिर शयन है।
तैर थके सब सरिता में, चले कूल ढूँढ़ने।
शाखाएं संभली नहीं, चले मूल ढूंढ़ने।।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *